श्रावण मास के उपलक्ष्य में मातृभूमि शिक्षा मंदिर द्वारा भारतीय सनातन परम्परा में शिव आराधना का महत्व विषय आज मातृभूमि सेवा मिशन के तत्वावधान में शिव संवाद कार्यक्रम संपन्न।
प्रकाशित: 07 Aug 2025, 03:52 PMसनातन परम्परा में शिव संपूर्ण योग और तत्त्वज्ञान के आदि स्रोत है - डा. श्रीप्रकाश मिश्र
श्रावण मास के उपलक्ष्य में मातृभूमि शिक्षा मंदिर द्वारा भारतीय सनातन परम्परा में शिव आराधना का महत्व विषय आज मातृभूमि सेवा मिशन के तत्वावधान में शिव संवाद कार्यक्रम संपन्न।
07 अगस्त 2025 कुरुक्षेत्र
भारतीय सनातन परंपरा में शिव केवल एक देवता नहीं, बल्कि सम्पूर्ण ब्रह्मांडीय चेतना के प्रतीक हैं। उन्हीं शिव से जुड़ा सावन मास, साधना, भक्ति और तात्त्विक चिंतन का विशेष समय माना जाता है। यह महीना जहां प्रकृति के जल चक्र से जुड़ा है, वहीं आत्मा और परमात्मा के गूढ़ संबंध को भी उद्घाटित करता है।
सनातन वैदिक संस्कृति में शिव आराधना का बहुत महत्व है। यह विचार श्रावण मास के उपलक्ष्य में मातृभूमि शिक्षा मंदिर द्वारा भारतीय सनातन परम्परा में शिव आराधना का महत्व विषय पर आयोजित शिव संवाद कार्यक्रम में मातृभूमि सेवा मिशन के संस्थापक डा. श्रीप्रकाश मिश्र ने व्यक्त किये। कार्यक्रम का शुभारम्भ शिव स्तुति से हुआ। शिव संवाद कार्यक्रम में मातृभूमि सेवा मिशन के तत्वावधान में वैदिक ब्रम्हचारियों द्वारा लोक मंगल के निमित्त एक वैदिक यज्ञ संपन्न हुआ। मातृभूमि शिक्षा मंदिर के विद्यार्थियों द्वारा सस्वर वेद मंत्रो द्वारा यज्ञ में आहुति डाली गई।
शिव संवाद कार्यक्रम को सम्बोधित करते हुए मातृभूमि सेवा मिशन के संस्थापक डा. श्रीप्रकाश मिश्र ने कहा भगवान शिव को कल्याणकारी, विध्वंसक और रक्षक माना जाता है।शिव आराधना के माध्यम से आत्म-बल, मानसिक शांति और आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त होती है। शिव आराधना सनातन वैदिक संस्कृति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जो व्यक्ति को शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक रूप से लाभान्वित करती है। शिव को आदि योगी कहा जाता है। सनातन परम्परा में शिव संपूर्ण योग और तत्त्वज्ञान के आदि स्रोत है। शिव लय और सृजन के दोनों पक्षों के धारक हैं। सनातन धर्म में उन्हें संहारकर्ता भी कहते हैं, लेकिन यह संहार बाह्य नहीं, बल्कि भीतर की विकृतियों का, अहंकार और अज्ञान का होता है।दार्शनिक दृष्टि से देखें तो सनातन परंपरा शिव को निर्गुण निराकार और सगुण साकार दोनों रूपों में स्वीकारती है। शिवलिंग का गोलाकार स्वरूप इस शून्य और अनंत के दर्शन को दर्शाता है।
डा. श्रीप्रकाश मिश्र ने कहा शिव वन्य संस्कृति के देवता भी है। शिवपार्वती को प्रकृति और पुरुष की अवधारणा से जोड़ कर देखा जाता है। शिव लोक कल्याण करने वाले देवता है। शिव सरल अर्चना से सहज ही प्रसन्न होने वाले देवता है,वे अपने उपासक का कल्याण करने को सदैव तत्पर रहते है।लोक जीवन में शिव आस्था की जड़े गहरे तक जमी हुई है। शिव आराधना एक शक्तिशाली साधना है जो जीवन को सुखमय और सफल बनाने में सहायक है। शिवजी की कृपा से व्यक्ति सभी दुखों से छुटकारा पा सकता है और मोक्ष की प्राप्ति कर सकता है। शिव वह चेतना हैं जहाँ से सब कुछ आरम्भ होता है, जहाँ सबका पोषण होता है और जिसमें सब कुछ विलीन हो जाता है।आप कभी शिव के बाहर नहीं हैं क्योंकि पूरी सृष्टि ही शिव में विद्यमान है। आपका मन, शरीर और सब कुछ केवल शिव तत्व से ही बना हुआ है, इसीलिए शिव को विश्वरूप कहते हैं, जिसका अर्थ है कि सारी सृष्टि उन्हीं का रूप है।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए आचार्य सतीश कौशिक ने कहा भारतीय सभ्यता और संस्कृति में भगवान शिव की व्यापक अभिव्यक्ति देखने को मिलती है। शिव का अस्तित्व केवल एक आराध्य देव के रूप में ही नहीं, बल्कि एक आदर्श, एक तत्त्व और एक दर्शन के रूप में भी है, जो भारतीय जीवन के हर पहलू में समाहित हैं।सांस्कृतिक रूप से, शिव भारत की विविधता में एकता का प्रतीक हैं। वे जनजातीय समाजों से लेकर उच्च वेदांत दर्शन तक सभी परंपराओं में पूज्य हैं। उनका रूप सादगी का संदेश देता है। भारतीय लोकजीवन में भी शिव सहज रूप से व्याप्त हैं। कार्यक्रम में विद्यार्थियों ने शिव भजन की प्रस्तुति दी। मातृभूमि सेवा मिशन की ओर से सभी अतिथियों को स्मृति चिन्ह एवं अंगवस्त्र देकर सम्मानित किया गया। कार्यक्रम का समापन कल्याण मंत्र से हुआ। कार्यक्रम में मातृभूमि मिशन मिशन के सदस्य, मातृभूमि शिक्षा मंदिर के शिक्षक , विद्यार्थी सहित अनेक गणमान्य जन उपस्थित रहे।
